झूम उठता है मयख़ाना, जब हाथों में जाम लेता हूं

शायरी और शराब, कभी कभी तो क्या, अक्सर लोग इन दो शब्दों का मतलब एक ही लगा लिया करते करते हैं। एंवईं मान लिया जाता है कि जहां शायरी वहां शराब, या जहां शराब वहीं शायरी।
शराब की महफिलों का जरूरी हिस्सा शायरी रही ही है। शायद इसीलिए शराब और शायरी को एक दूसरे का पर्यायवाची मान लिया गया है। लेकिन क्या वाकई ऐसा है, शायद नहीं, और शायद हां भी। जो भी हो एक सच तो ही है कि शराब की तरफ लोगों का झुकाव पैदा करने में शायरी की भी भूमिका कम नहीं रही है। शराब का आकर्षण शायरी ने खूब बढ़ाया है। इस दौर के उन शायरों में जिन्होंने शराब को अपनी शायरी में बड़े सलीके से पिरोया है, गोपाल दास ’नीरज’ का नाम सबसे ऊपर है। ’प्रेम पुजारी’ का ये हिट गीत लिख कर तो उन्होंने शराब और प्यार के फलसफे को नए अर्थ दे दिए।

शोखियों में घोला जाए, फूलों का शबाब,
उसमें फिर मिलाई जाए, थोड़ी सी शराब,
होगा यूं नशा जो तैयार, वो प्यार है….!

इस गीत के बाद तो उनकी धूम मच गई और पीने वालों ने इसे ’शराब गान’ का दर्जा दे दिया। शराब की हर महफिल का ये गीत जरूरी हिस्सा बन गया। ये नीरज का ही कमाल था कि उन्होंने कहा कि जो प्यार है, उसके मूल में क्या है, और ये प्यार कितना जबर्दस्त नशा है। हालांकि ऐसा नहीं था कि इस गीत के हिट होने से पहले शराब को केंद्र में रखकर गीत लिखे नहीं गए और हिट नहीं हुए। लेकिन इस गीत के सौंदर्यशास्त्र ने किसी को प्रभावित न किया हो, ऐसे लोग बहुत कम मिलेंगे।

नीरज के अगर सिर्फ फिल्मी गीतों की ही बात की जाए तो उनके कई लोकप्रिय गीतों में शराब या शराब की प्यास या प्यार की प्यास जैसी शब्दावली का बड़े खूबसूरत ढंग से प्रयोग किया गया है। उन्होंने जहां पर शराब लफ्ज़ का इस्तेमाल नहीं भी किया है वहां उन्होंने शराब से जुड़ी शब्दावली का बड़ा भरपूर इस्तेमाल किया है। मसलन…’आज मदहोश हुआ जाए रे…’ और ’सांस की शराब का खुमार देखते रहे….’, ’चाल ऐसी है मदहोश मस्ती भरी…’, ’आखों से कोई राज़ न पिलाए….’ जैसे कई गीतों की परिकल्पना में कहीं न कहीं शराब जरूर रही है। शराब नीरज के जीवन में कितनी अहम थी, उन्हीं के शब्दों में:

बादलों से सलाम लेता हूं , वक्त के हाथ थाम लेता हूं
सारा मयख़ाना झूम उठता है जब मैं हाथों में जाम लेता हूं

वह जब भी लखनऊ आते, मीराबाई मार्ग स्थित राजकीय गेस्ट हाउस में ही रुकते थे। करीब पांच साल पहले की बात है, उनसे वहीं मुलाकात हुई थी, तन से भले ही लट गए लगते थे लेकिन मन में तरंगे उठना कम नहीं हुई थीं। देर शाम महफिल जमी थी, उनके पैग लेने का अंदाज आज भी याद है।  भारतीय सिनेमा के सौ साल पूरे होने पर उनसे टेलीफोन पर इंटरव्यू किया था, काफी देर तक उन्होंने खूब बातें की थीं। पिछले साल ही 19 जुलाई को 93 साल की उम्र में स्वर्गवास हो गया। शराब का रसिया और एक बेहतरीन ज़िंदादिल शायर, हमारे बीच नहीं रहा।
’मरघट है वह मदिरालय अब घिरा मौत का सघन अंधेरा….’
उन्हें उनकी 94वीं सालगिरह पर विनम्र श्रद्धांजलि!

सुहेल वहीद

शराब पर ऐसी शायरी आप ने कभी नहीं सुनी होगी।

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