हबीब के झोले में रहती थी व्हिस्की

प्रख्यात रंगकर्मी हबीब तनवीर, हिंदुस्तान के थियेटर आर्टिस्ट के रूप में उन्होंने हिंदुस्तानी स्टेज को जितना दिया उतना शायद किसी ने नहीं। उन्हें रंगमंच का भीष्म पितामह कहा जाता है। वह एक पत्रिका के सह सम्पादक भी रहे और फिल्मों से भी जुड़े रहे। हबीब तनवीर भी शराब के रसिया थे, उनके शराब पीने का जैसा स्टाइल था वैसा शायद ही किसी का हो। दांत में दर्द हुआ तो शीशी खोली और ज़रा सी वहां पर टपका ली। सर में दर्द महसूस हुआ तो पास बैठे किसी शख्स से कहा कि भाई ज़रा सी ऊपर लगा दो। शराब शाम होने के बाद ही पीते थे लेकिन उनका सिगार हर वक्त जला रहता था। दिल्ली के मंडी हाउस में कई लोगों के साथ बैठे थे, काॅफी आई सबने पीना शुरु की हबीब तनवीर ने अपने झोले से व्हिस्की निकाली काॅफी में थोड़ी सी डाली और पीने लगे। इस तरह पीने को इससे पहले कई लोगों ने नहीं देखा था। लेकिन जो उन्हें जानते थे, उनके लिए यह कोई नई बात नहीं थी।

हबीब तनवीर के झोले में रहती थी व्हिस्की

हबीब तनवीर पृृथ्वी राज कपूर की परंपरा के शायद आखिरी ड्रामा आर्टिस्ट थे। उन्हें उनके योगदान के लिए पहले पदमश्री फिर पदमभूषण से सम्मानित किया गया। वह राज्य सभा के सांसद भी रहे और दर्जनों पुरस्कार और फेलोशिप्स उन्हें मिलीं। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से एमए करने के बाद उन्होंने लंदन में राॅयल एकेडमी ऑफ़ ड्रामेटिक आर्ट से प्रशिक्षण लिया था। प्रगतिशील लेखक संघ से पूरे जीवन जुड़े रहे और इप्टा के तो वह अभिन्न अंग थे।

हबीब तनवीर के झोले में रहती थी व्हिस्की

उनकी विख्यात कृृतियों में ’आगरा बाजार’ और ’चरनदास चोर’ को भुलाया नहीं जा सकता। आगरा बाज़ार हजारों बार स्टेज किया। उन्होंने करीब डेढ़ दर्जन फिल्मों की स्क्रिप्ट भी लिखी और करीब दर्जन भर ड्रामे स्टेज किए जिनकी स्क्रिप्ट उन्होंने ही लिखी थी। उन्होंने मध्य प्रदेश के आदिवासियों पर भी बहुत काम किया। वह जबर्दस्त किस्म की प्रतिभा के धनी कलाकार थे और बेहद सलीके से पीने वाले भी थे। उन्होंने शायद ही कभी पूरे गिलास में शराब फिर उसमें सोडा और पानी मिलाकर पिया हो। जवानी में तो पता नहीं, इस पर वह बात भी नहीं करते थे, लेकिन 90 के दशक के आखिर से उनको इसी तरह पीते देखा गया कि वह कहीं भी बैठे हैं, ड्रामा चल रहा है या कोई प्ले हो रहा है, वह अपने झोले से निकालते और हल्के से एक दो सिप लेकर शीशी वापस अपने झोले में रख देते थे।

हबीब तनवीर के झोले में रहती थी व्हिस्की

पूरे जीवन उन्होंने शराब को अपना सबसे करीब रखा। उनके पढ़ने और लिखने के समय भी शराब उनके पास ही रहती थी। कई बार वह पढ़ने में इतने तल्लीन हो जाते कि पीना भूल जाते लेकिन शराब रहती उनके पास ही थी। अपने अंतिम दिनों में भी वह शराब के लिए परेशान रहते थे। हालांकि मौत से पहले वह एक महीने भी बीमार नहीं रहे। उनका जन्म एक सितम्बर 1936 को छत्तीसगढ़ के रायपुर में हुआ था। टीम चीयर्स डाॅट काॅम की ओर से उन्हें उनके 96वें जन्म दिन पर श्रद्धांजलि।

चीयर्स डेस्क

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