शराब बिक्री में यूपी को 10 साल में 24 हजार का घाटा

यूपी में शराब की बिक्री में तरह तरह के खेल होते रहे हैं जिसका खामियाजा सरकार और शराब उपभोक्ता, दोनों को उठाना पड़ता है। हाल ही में भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक की यूपी की विधान सभा में पेश की गई ताजा रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि पूर्व सरकारों की शराब नीति में अनयिमितताओं के कारण दस साल में प्रदेश को लगभग 24 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। सीएजी ने इस पूरे घोटाले की सर्तकता एजेंसी से से जांच कराने की सिफारिश की है।

इस रिपोर्ट के मुताबिक, मायावती के शासनकाल में शुरू हुआ शराब घोटाला सपा सरकार में भी चलता रहा। घोटाला शराब कंपनियों, शराब बनाने वाली डिस्टलरियों, बीयर बनाने वाली ब्रेवरी और सरकार की मिलीभगत से हुआ। वर्ष 2008 से 2018 के बीच एक्स डिस्टलरी प्राइस व एक्स ब्रेवरी प्राइस का निर्धारण शराब बनाने वाली डिस्टलरियों व बीयर बनाने वाली ब्रीवरियों के विवेक पर छोड़ दिया गया। इससे 7,168 करोड़ का सरकारी खजाने को चूना लगा। इसके अलावा 3,674 करोड़ के राजस्व का नुकसान होने से बच जाता अगर देशी शराब में न्यूनतम गारंटी कोटा बढ़ा दिया जाता।

रिपोर्ट कहती है कि वर्ष 2008 से 2018 की आबकारी नीति के जरिए शराब बनाने वाली डिस्टलरी और बीयर बनाने वाली ब्रेवरी हर बोतल पर आने वाले लागत मूल्य के साथ अपना लाभांश जोड़कर कुल अधिकतम खुदरा मूल्य तय करने के लिए आजाद छोड़ दिए गए। जबकि यह जिम्मेदारी राज्य सरकार की होनी चाहिए थी। नतीजतन, उत्तर प्रदेश में डिस्टलरियों द्वारा देश में बनी अंग्रेजी शराब व बियर के दाम का दूसरे प्रदेशों से ज्यादा निर्धारण किया गया।

इतना ही नहीं, भारत में निर्मित अंग्रेजी शराब और बियर के लिए न्यूनतम गारंटी कोटा तय न किए जाने के कारण सरकारों को 13,246 करोड़ के राजस्व का घाटा हुआ। सीएजी ने माना है कि सरकारी अफसरों का भ्रष्टाचार मुख्य वजह रही। रिपोर्ट में मायावती के शासनकाल में 2009 में शराब बिक्री लिए बनाए गए विशिष्ट जोन को भी गलत करार दिया गया है। यह जोन उस वक्त मायावती के करीबी माने जाने वाले शराब कारोबारी पोंटी चड्ढा के समूह को फायदा पहुंचाने के लिए बनाया। सीएजी की सैम्पल जांच में डिस्टलरियों के अंग्रेजी शराब व बीयर के ब्रांडों की तुलना पड़ोसी राज्यों से करने पर पता चला कि उपभोक्ताओं व सरकारी खजाने की कीमत पर 7168.63 करोड़ का अनुचित लाभ दिया गया।

चीयर्स डेस्क 

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