रेगिस्तान को हरा भरा करने की ज़िद

मछली जल की रानी हे जीवन उसका पानी है, हाथ लगाओ तो डर जाएगी बाहर निकालो तो मर जाएगी..आप में से हर किसी ने बचपन में यह गाना गाया या गुनगुनाया होगा, पर क्या कभी यह सोचा है कि पानी पर केवल मछली का ही नहीं, हम सभी का जीवन निर्भर है। पानी की इसी महत्ता के चलते उसे वेदों में तो स्थान  मिला ही, वह हिंदू धर्म के पांच मूल तत्वों- हवा, आग, धरती और आकाश में शामिल है, जिनसे यह ब्रह्मांड बना। बिना जल के जीवन को कल्पना नहीं की जा सकती है, पर पानी का इस्तेमाल करते समय हम इस बात को भूल जाती हैं।

उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में जन्मे और अब “जल पुरुष’ के नाम से देश भर में जाने-पहचाने जाने वाले राजेंद्र सिंह ने यह बात बहुत पहले ही समझ ली थी। वह छोटे थे, तभी से पानी को लेकर उनके मन में एक अजीब सा आकर्षण था, तड़प थी। आकाश से बरसते मेघ, पानी की बहती धारा, तालाब और नदियों को देख वह जहां खुश होते वहीं सूखा-अकाल पड़ने को खबरें, पानी को लेकर रोजमर्रा की लड़ाई, जद्देजहद की खबरें, रेगिस्तानी इलाकों में पीने के पानी के लिए महिलाओं -पुरुषों की कई-कई किलोमीटर की यात्रा करने की खबरें उनका दिल दुखा देतीं। राजेंद्र सिंह का जन्म 6 अगस्त, 1959 को उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के डौला गांव में हुआ। वह अपने सात भाइयों में सबसे बड़े थे । जमींदार परिवार के पास खेती के लिए लगभग 60 एकड़ जमीन थी। उन पर परिवार का मुखिया बनने का दबाव था।

हाईस्कूल पास करने के बाद उन्होंने आयुर्विज्ञान में डिग्री ली और गांव में प्रैक्टिस करने लगे। वह्मं उन्होंने पानी की समस्या को और करीब से जाना। उन्हें लगा कि धरती पर जब जल ही नहीं होगा, तो इंसान जिंदा ही नहीं रह पाएगा। तो कैसा स्वास्थ्य और केसी खेती ? बिना पानी के तो पेड़-पौधे भी नहीं बचेंगे। हरियाली, पर्यावरण और स्वास्थ्य भी तो पानी से ही जुड़ा है। इसके लिए उन्होंने उस इलाके को चुना, जहां पानी की बड़ी समस्या थी। यह राजस्थान राज्य था। कहते हैं कि साल 1984 में अपनी शादी के कुछ समय बाद ही उन्होंने घर का सारा सामान तेईस हजार रुपये में बेच दिया और पानी बचाने की लड़ाई लड़ने चल पड़े।

राजेंद्र सिंह ने ठान लिया कि वह पानी की समस्या का कुछ ठोस हल निकालेंगे। आठ हजार रुपये बैंक में डालकर शेष पैसा इस काम के लिए लगा दिया। यह 1980 का दशक था। उनके साथ कुछ और लोग आ जुटे | उन्होंने “तरुण भारत संघ’ नामक गैर-सरकारी संगठन से जुड़ कर काम शुरू किया। उन्होंने सबसे पहले बारिश के पानी को बचाने की सोची और कुछ गांव वालों की मदद से छोटे-छोटे पोखर बनाने शुरू किए। उनकी कोशिश थी कि ये पोख़र अगर बारिश के पानी से भरे रहें, तो इनसे पानी की शुरुआती जरूरत तो पूरी होती ही धरती के नीचे भी जल का स्तर बढ़ जाता। शुरू में इनका मजाक भी उड़ाया गया, पर वे पानी बचाने की मुहिम में जुटे रहे।

गांव-गांव में जोहड़ (कच्चा तालाब) बनने लगे। पुराने जोहड़, तालाब की सफाई होने लगी और पानी बचाया जाने लगा। जवाब में रेगिस्तान में भी बरसात होने लगी। बंजर धरती लहलहाने लगी। अब तक सिंह की अगुआई में करीब सात हजार से ज्यादा जोहड़ बन
चुके हैं। अब राजस्थान के हजार से अधिक गांवों में पानी की कमी नहीं है। लोगों की मदद से वे ग्यारह हजार हाई तर आठ सौ एनीकट्स और चेक डैम बनवा चुके हैं। ढाई लाख सूखे पड़े कुओं में फिर से पानी आने लगा है। फिर भी पानी से जुड़े इस अभियान में अभी काफी कुछ किया जाना बाकी हे।

याद रहे कि दुनिया की कुल आबादी में से लगभग 8 प्रतिशत आबादी भारत में रहती है, जबकि हमारे पास जल संसाधन महज चार प्रतिशत हैं। अनुमान है कि हर साल दो लाख से अधिक लोग शुद्ध पानी की कमी से मर जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक,  भारत में लगभग 9.7 करोड़ लोगों को पीने का साफ पानी उपलब्ध नहीं होता है। गांवों में तो स्थिति और भी खराब है। वहां लगभग 70 प्रतिशत लोग अब भी प्रदूषित पानी पीने को ही मजबूर हैं। पानी की बरबादी अगर नहीं रोकी गई, तो साल 2040 तक पीने का पानी बचेगा ही नहीं। यह ठीक है कि जलपुरुष राजेंद्र सिंह की मुहिम आज पूरे देश में फैल चुकी है।

दुनिया भर में उनके काम की सराहना की गई और उन्हें सम्मान भी मिला। उन्हें पानी के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार के बराबर समझा जाने वाला स्टॉकह्नेम वाटर प्राइज मिल चुका है। साल 2008 में गार्डियन संस्था ने उन्हें 50 ऐसे लोगों की सूची में शामिल किया था, जो इस धरती को बचा सकते हैं। जाहिर हे इस धरती, जल और जीवन को बचाने के अभियान को आप सबके साथ की जरूरत है।

सुजाता शिवेन 

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