मैकडाॅवल नंबर वन का तेज़ झटका

अभी ज्यादा दिन नहीं गुज़रे हैं जब यूपी, बिहार और दिल्ली में मैकडॉवेल  नंबर वन शराब की तूती बोलती थी। सबसे अधिक बिकने वाला ब्रांड यही था और सबसे तेज़ नशा पैदा करने में भी इस ब्रांड का जवाब नहीं था। शायद इसीलिए इसे आम शराब उपभोक्ता जो कम पैसे में अधिक नशा करने की गलतफहमी में जीता है, इसके चक्कर में आ जाता था।

मैकडाॅवल नंबर वन का मामला यह था कि सवा सौ का पव्वा होता था और पूरा पव्वा लगा कर लोग हिलने डुलने की स्थिति में आ जाते थे। इसका गाढ़ा सा तीखा तेज़ स्वाद और हिट करने वाला नशीला स्ट्रोक, गरीब मेहनत कश आदमी को भाता था। इसके लोकप्रिय होने के सबसे बड़े दो ही कारण थे, एक तो तेज़ हिट करने वाला नशीला स्ट्रोक और दूसरे दाम कम होना।

Image result for मैकडोवेल नो.1लेकिन यह बात शायद बहुत कम लोग जानते हैं कि यह सबसे अधिक नुकसान करने वाली शराब थी। यूपी, बिहार और दिल्ली में बिकने वाली इस शराब को बनाने की विधि भले ही आधुनिक हो लेकिन इसके अवयवों के प्रसंस्करण की विधि आधुनिक नहीं थी। इसकी निर्माता कम्पनी में काम करने वाले एक कर्मचारी के अनुसार अन्य ब्रांड की तरह ही मैकडाॅवल नंबर वन के निर्माण के लिए भी खाद्य पदार्थों फलों आदि को डिस्टिल्ड किया जाता था और इसके फर्मेन्टेशन में आधुनिक प्रणाली का इस्तेमाल किया जाता था। लेकिन इसमें इथेनाॅल मिक्स्चर की पानी के साथ मात्रा को आधे से डेढ़ प्रतिशत तक कम ब्वाएल्ड किया जाता था, इसी कारण इसका स्वाद और प्रभाव तेज़ हो जाता था।

जिस प्रकार से मैकडाॅवल को तेज़ किए जाने के जतन कम्पनी ने जाने या अनजाने में किए, उसका नुकसान सिर्फ और सिर्फ शराब उपभोक्ता को हुआ। मैकडाॅवल पीने वाले अधिकांश उपभोक्ताओं के शरीर में इस ब्रंाड को पीने से स्थिर कंपन की स्थिति पैदा हो गई। उनके शरीर से स्थायी रूप से दुर्गन्ध भी निकलने लगी और उनके मुंह से बदबू में एक विशेष प्रकार की मैकडाॅवल के स्वाद जैसी बदबू आने लगी। मैकडाॅवल के कई उपभोक्ताओं का कहना है कि इस ब्रांड का बंद हो जाना अच्छा हुआ, वह बंद हुआ तो उन लोगों ने दूसरे ब्रांड का सेवन शुरु किया और जब समझ में आया कि वह कितना खराब था।

मैकडाॅवल की इस निर्माण प्रक्रिया के कारण ही उसे पीने के बाद उपभोक्ता के शरीर में डिहाइड्रेशन की गति अति तीव्र हो जाती थी। इतनी अधिक कि अगले चैबीस घंटों में यदि उपभोक्ता कम से कम 15-17 गिलास पानी नहीं पिए तो उसका स्वास्थ्य ठीक नहीं रह सकता।यदि उपभोक्ता नियमित रूप से दो पैग से अधिक मैकडाॅवल पीता था तो निश्चिति रूप से उसका पेट भी इसी कारण बिगड़ जाता था क्योंकि वह जब तक दस पंद्रह गिलास पानी पीता था तब तक अगली शाम आ जाती थी और वह फिर से मैकडाॅवल पी लेता था। इसके विपरीत इसी श्रेणी और दाम के इसी रेंज की अन्य ब्रांड की इतनी ही मात्रा में शराब पीने से इस प्रकार की कोई शारीरिक समस्या नहीं होती थी।

दुर्भाग्य से इस ब्रांड को पीने वाले उपभोक्ताओं का स्वास्थ सर्वे नहीं किया गया और यह ब्रांड बाजार से गायब भी हो गया। लेकिन यदि यह ब्रांड इसी प्रकार चलता रहता तो हजारों शराब उपभोक्ताओं की मौत का कारण भी बनता। कुछ शराब निर्माता कंपनियां अभी भी बाजार में ऐसी हैं जो इसी तरह तेज़ नशा पैदा करने के लिए शराब के निर्माण में  इस प्रकार के घपले कर शराब उपभोक्ताओं के जीवन से खिलवाड़ करती हैं।

चीयर्स डेस्क

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