फिर सांस लेने लगी पहाड़ की एक भूली-बिसरी नदी

यह चमत्कार भी है और पर्यावरण की चिंता करने वालों के लिए एक महत्वपूर्ण जानकारी भी। देश के विभिन्न हिस्सों में दम तोड़ रही नदियों को बचाने की लड़ाई इससे मजबूत भी होगी। दक्षिण से उत्तर की तरफ बहने वाली भवाली की एक छोटी सी नदी शिप्रा का पानी अब साफ नजर आता है। साल-दो साल पहले तक यह नदी दम तोड़ रही थी। ज्यादातर लोग इसे नाला ही समझते थे, जिसमें श्यामखेत और भवाली के गंदे नालों का पानी बहाया जाता था। बहुत से घरों का सीवर भी इसी नदी में खुलता था। भवाली को कुमाऊं का द्वार कहा जाता है। यह एक कस्बा भी है। और शिप्रा नदी पास के श्यामखेत से उतरकर इसी कस्बे के बाजार के पीछे से बहती है। कहीं-कहीं पर अगर यह दिख भी जाती, तो लगता कि शहर का कोई बड़ा नाला बह रहा है। यह धारणा ऐसे ही नहीं बनी। लेकिन कुछ लोगों ने पहल की और अब यह नदी बच गई। लोग जागरूक हुए, तो शासन-प्रशासन और सरकार ने भी इस नदी को बचाने में सहयोग करना शुरू कर दिया है।

यह नदी श्यामखेत में नानतिन बाबा आश्रम के पास से निकलती है। जब विकास का काम तेज हुआ, तो इसके उद्गम स्थल के आस-पास भी अतिक्रमण हुआ और इसके रास्ते पर भी। यहां तक कि इसका रास्ता भी बदल दिया गया। जो नदी दो दशक पहले तक हर मौसम में बहा करती थी, उसका पानी ठहर गया। बरसात को छोड़ यह नजर ही नहीं आती। श्यामखेत के जिन मैदानी इलाकों से आज यह नदी एक पतली धारा के रूप में निकलती है, अस्सी-नब्बे के दशक में लोग उसकी धारा में दूर-दूर तक तैरा करते थे। लेकिन अब यह सब अतीत की बातें हो चुकी हैं। सिर्फ बारिश के मौसम में दिखाई देने वाली यह धारा अब सदानीरा की तरह फिर से नजर आने लगी है।

पिछले कुछ समय में लोगों ने इसके महत्व को फिर से समझना शुरू किया। कुछ नौजवान सामने आए, जिन्होंने साझा प्रयास से शिप्रा नदी की सफाई शुरू कर दी। नदी में गिरने वाली 40 से ज्यादा सीवर लाइनों को बंद कराया गया। नदी किनारे जिन लोगों की दुकानें थीं, उन्हें भी नदी को साफ रखने की मुहिम से जोड़ा गया। यह काम आसान नहीं था। कैची धाम मंदिर के आस-पास तो मंदिर से लगी दुकानों के लोग नदी में ही कचरा फेंकते। उन्हें बहुत मुश्किल से समझाया गया और नदी का पानी साफ-सुथरा रखने के अभियान से जोड़ा गया। इसमें सबसे बड़ी समस्या तो कचरा निस्तारण की थी। भवाली में कूड़ा-कचरा इकट््ठा करने और उसे उचित जगह तक ले जाने की कोई नियमित व्यवस्था नहीं थी। लोग सड़क किनारे या फिर नदी में ही कचरा फेंक देते थे। लेकिन मुहिम छिड़ने के बाद लोगों ने चंदा जमा करके 15 कूडे़दान स्थानीय निकाय को दिए, जिससे भवाली को साफ और स्वच्छ रखने में मदद मिली। अब यह बदलाव भवाली में देखा भी जा सकता है। दुकानदारों को भी कूड़ेदान दिए गए, ताकि नदी को कचरे से बचाया जा सके। लेकिन यह तो नदी को साफ रखने का प्रयास था। शिप्रा में पानी बना रहे, यह प्रयास भी शुरू किया गया है। नदी के आस-पास फिर से पेड़-पौधे लगाए जाएं और चेक डैम बनें, यह भी जरूरी है। इस दिशा में भी छोटी पहल हुई है। लेकिन अभी तक जो हुआ है, उससे ही मछलियों से भरी इस नदी का काया-कल्प हो गया है। कैंची धाम में इसका पानी बहुत साफ दिखाई देता है। भवाली से मुक्तेश्वर जाने वाली सड़क पर बनी पुलिया के नीचे भी शिप्रा का पानी साफ नजर आता है।

निस्संदेह, नदी और जल स्रोत को लेकर आम लोगों की चिंता भी कुछ वर्षों में बढ़ी है। इसका एक कारण बढ़ता जल संकट भी है। नैनीताल से मुक्तेश्वर के बीच 40 फीसदी से ज्यादा पानी के प्राकृतिक स्रोत और झरने समाप्त हो चुके हैं। हाल के वर्षों में गांवों तक पक्की सड़क की मांग बढ़ी। इस वजह से भी पानी के बहुत सारे प्राकृतिक स्रोत, जो सड़क के आस-पास थे, सड़क निर्माण के चलते बंद हो गए। पानी के स्रोत बंद हुए, तो बरसाती नदी-नालों का पानी भी कम होता गया। शिप्रा नदी पर स्थानीय लोगों की कोशिश ने यह तो दिखा ही दिया कि कम से कम छोटी नदियों को साफ करने के लिए बडे़ नीतिगत निर्णयों की जरूरत नहीं है, लोग जागरूक हों, तो यह काम स्थानीय प्रयास से ही हो सकता है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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