फिराक़ गोरखपुरी की जीवन संगिनी जैसी थी शराब

रघुपति सहाय फिराक़ गोरखपुरी, उर्दू शायरी की आन बान शान कहा जाए तो ग़लत नहीं होगा। ज्ञानपीठ अवार्ड से सम्मानित फिरका को पदम भूषण से भी नवाज़ा गया। फिराक गोरखपुरी के लिए कहा जाता है कि उर्दू शायरी में अगर वह नहीं आते तो उर्दू शायरी हिंदू धर्म की संस्कृृति और उत्तर भारत की मिली जुली बोली की चाशनी से महरूम रह जाती। वह उर्दू के बेहतरीन शायर होने के अलावा वह अंग्रेजी साहित्य, संस्कृृत साहित्य और हिंदी साहित्य के भी प्रकांड पंडित थे।

चुनाव प्रचार में मंच पर ही पी फिराक़ गोरखपुरी ने शराब

फिराक के साथ साए की तरह रहने वाले उनके प्रिय रमेश चंद्र द्विवेदी ने फिराक के साथ अपने संस्मरण एक किताब में लिखे हैं। किताब का नाम है ’मैंने फिराक को देखा था’, ये शीर्षक भी फिराक के एक शेर ’आने वाली नस्लें तुम पर रश्क करेंगे हमसफरों, जब तुम कहोगे कि मैंने फिराक को देखा था’ के एक मिसरे से लिया है। रमेश चंद्र द्विवेदी ने इस किताब में न जाने कितने संस्मरण ऐसे लिखे हैं जिनमें शराब और फिराक का जिक्र है। उन्हीं में से एक संस्मरण में लिखते हैं।

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’कुंवरजी ने स्काॅच व्हिस्की का इंतजाम कर रखा था, वैट 69, भुनी हुई मछली कलेजी और स्काॅच। रात लकलका रही थी। शीशे के चमाचम गिलासों में हल्की सुर्ख स्काॅच और उसमें हसीनों के अक्स। दिमाग़ उड़ रहा था। और दिल बल्लियों उछल रहा था। एक सुवासित कमरे में प्यालों की खनक, क़हक़हों की गूंज फिराक की उपस्थिति और लोगों की लालायित आंखें इन्द्रसभा का भरपूर मंज़र उपस्थित कर रही थीं। सुन्दर सुन्दर समझदार पुरुष और सुन्दर वस्त्रों व आभूषणों में सजी नारियां फिराक़ के बड़े बड़े कैमरे की आंखों की तरह घूमते नेत्र ऐसे महसूस करा रहे थे जैसे कालिदास की कविता सजीव हो उठी हो। फिराक़ ने कहाः-

छलक के कम न हो ऐसी कोई शराब नहीं
निगाहे नरगिसे रानां तेरा जवाब नहीं

लोग चुप थे, नारियों के आबरूओं की कमानें लचक लचक कर दाद दे रही थीं। बुजुर्गवार बोल उठे अरे दोस्तों अपनी भावनाओं को दबाओ मत, खुलकर दाद दो, यह खुला दरबार है। फिर क्या था वाह वाह से कमरा गूंजने लगा। फिराक शेर पर शेर सुनाए जा रहे थे और लोग डूब रहे थे उतरा रहे थे। कुछ बुरके वालियों ने बुरके उतारना शुरु कर दिए। हकीकतें बेनकाब हो रही थीं।

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शायरी ने सबको अपने अपने चेहरे दे दिए थे। बुजुर्ग अपना सिर धुन रहे थे। फिराक ने कहा भाई एक गिलास में चार अंगुल स्काॅच ढाल कर मेरे सामने रख दो। कुंवरजी ने पूरी एक स्काॅच की बोतल खोलकर फिराक के सामने रख दी। फिराक़ ने आधा गिलास भर लिया और थोड़ी देर में एक घूंट में पी गए। कहने लगे इस बार कुछ कड़ी ज्यादा लग रही है। बुजुर्गवार ने कहा सरकार आप बिना पानी मिलाए ही पी गए, इसलिए’।

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ऐसे थे फिराक के पीने के किस्से। फिराक़ की शायरी और उनकी जिंदगी के जितने भी किस्से हैं, शराब का उनमें जिक्र बड़े शायराना अंदाज में  आता है। फिराक़ को शराब पीने से ज्यादा उसके इस्तेमाल का शौक़ था। वह पीते तो पाबंदी से थे ही, शराब के साथ उनका बर्ताव भी बेहद शानदार किस्म का था। वह इसलिए नहीं पीते थे कि नशा हो जाए। वह तो इसलिए पीते थे कि तमाम इंद्रियों को ताकत मिल जाए।

रमेश चंद्र द्विवेदी की पूरी किताब फिराक़ की शायरी, शायरी की महफिलें और शराब से भरी पड़ी है। शराब को फिराक की जीवन संगिनी का नाम दिया जाए तो ग़लत नहीं होगा। इस किताब को पढ़ने के बाद तो यही ख्याल आता है। फिराक को उनकी 123वीं जन्म दिन पर चीयर्स डाॅट काॅम की भावभीन श्रद्धांजलि।

चीयर्स डेस्क


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