प्रदूषण ही नहीं दवाएं भी घोल रही हैं नदियों में जहर

जैसे दिल्ली बेहद खराब वायु गुणवत्ता से जूझ रही है, वैसे ही नदी जल की खराब गुणवत्ता से पूरा देश जूझ रहा है। हमारे शरीर की कुल संरचना का 70 प्रतिशत हिस्सा पानी है। पानी वैश्विक खाद्य आपूर्ति, आर्थिक संपन्नता और सभी जीवों के अस्तित्व में केंद्रीय भूमिका निभाता है। जल का महत्व इस बात से भी पता चलता है कि प्राचीन काल में सभी प्रमुख सभ्यताएं नदियों के किनारे ही विकसित हुई थीं। नदियां और जल स्रोत जीवन देने वाली संपदा हैं, लेकिन नदी प्रदूषण पिछले कुछ दशकों में दुनिया भर में चिंता का मुख्य कारण बन गया है। इसके सामान्य कारणों में औद्योगिक मलबा, खुले में शौच, रासायनिक और दवा उद्योगों द्वारा फेंका गया गैर-शोधित कचरा, अस्पतालों व स्वास्थ्य केंद्रों, पशुपालन इकाइयों द्वारा फेंका गया मलबा शामिल है। हैदराबाद के जल स्रोतों में रासायनिक अवशेषों की अत्यधिक मौजूदगी के बारे में हाल ही में रिपोर्ट आई है। इससे पता चलता है कि जल स्रोतों में हो रहे प्रदूषण से निपटने में हमारा बुरा हाल है। भारत सहित दुनिया की कई नदियों में एंटीबायोटिक दवाओं जैसे सिप्रोफ्लोक्सासिन, नॉरफ्लोक्सासिन, ऑक्सीटेट्रासाइक्लिन और ओफ्लॉक्सासिन की उच्च मात्रा बताई गई है। सवाल यह है कि सतह और भूजल में रसायनों, विशेष रूप से दवाओं की उच्च मात्रा कैसे खतरा पैदा कर रही है?

जॉन स्नो ने पहली बार ढंग से यह बताया था कि 1854 में लंदन के ब्रॉड स्ट्रीट में हैजा फैलने की वजह एक सार्वजनिक कुएं में मल बैक्टीरिया से भरा रिसाव था। लेकिन यह सिर्फ जहरीले जल के सेवन से जुड़ा खतरा नहीं है। वर्ष 2000 में सिफुएंट ने पहचाना था कि सिंचाई के रास्ते भी जल प्रदूषण और स्वास्थ्य के बीच कड़ी तैयार हो रही है। कर्र ने 2001 में प्रदूषित पानी से होने वाले रोग संचरण में स्नान, भोजन और व्यक्ति से व्यक्ति संपर्क की भूमिका को रेखांकित किया था। 2010 में एबेंस्टीन की रिपोर्ट ने बताया, चीनी नदी के पानी की गुणवत्ता में जो गिरावट आई है, उससे पाचन संबंधी कैंसर की शिकायतें 9.7 प्रतिशत बढ़ी है। 2011 में ब्रेनर्ड और मेनन ने बताया कि भारतीय नदियों में कृषि-रासायनों की मात्रा में 10 प्रतिशत की बढ़त हुई है, जिससे गर्भवती महिलाओं पर खतरा बढ़ा है, नवजात की एक वर्ष के अंदर मौत की आशंका भी 11 प्रतिशत बढ़ी है। नवजातों पर प्रदूषित जल का खतरा सबसे ज्यादा है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारतीय उद्योग अपना गैर-शोधित या आंशिक-शोधित मलबा पास के जल स्रोतों या नदियों में बहा देते हैं। नदियों में गैर-शोधित मलबा जब लगातार बहता है, तब उनका पानी पीने, खेती करने या औद्योगिक उपयोग योग्य भी नहीं रह जाता है।

1985 में भारत सरकार ने गंगा नदी को साफ करने के लिए गंगा एक्शन प्लान की शुरुआत की थी। अगले तीन दशकों में ऐसी ही योजना में देश की तमाम नदियों को शामिल कर लिया गया। अभी 20 राज्यों में 41 नदियों के तट के 190 शहर राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना के तहत शामिल हैं। यह देश में नदी संरक्षण के लिए चलाई जा रही प्रमुख योजना है। ब्रैंडन और होम्मन (1995) बताते हैं कि घरेलू जल प्रदूषण का बीमारियों पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा। उनका कहना है, पूरे भारत में स्वच्छ जल आपूर्ति और स्वच्छता से तीन से आठ अरब डॉलर तक की बचत संभव है।

दवाइयों को जीवित जीवों पर कम मात्रा में उपयोग के लिए बनाया गया है, लेकिन इनकी बहुत कम मात्रा भी शुद्ध जल को खराब कर देती है। एक आंकड़ा है कि 10 प्रतिशत दवाइयों में पर्यावरण को क्षति पहुंचाने की क्षमता होती है। हॉर्मोन्स, दर्द-निवारक और अवसाद-रोधी दवाएं ज्यादा चिंता का विषय हैं। दवाइयों का असर जल-जीवों और मछलियों पर भी पड़ रहा है। यदि पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए, तो हालात बिगड़ते चले जाएंगे। ध्यान रहे, जैसे-जैसे आबादी बूढ़ी होगी, वैसे-वैसे दवाइयों का उपयोग भी बढ़ता जाएगा। भारत 2030 तक अपनी नदियों को साफ करना चाहता है, लेकिन अगर यूं ही चलता रहा, तो यह काम दूर की कौड़ी साबित होगा। लक्ष्य कठिन लगता है, क्योंकि सरकार के अपने आंकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में देश भर में नदियों के प्रदूषित हिस्सों की संख्या बढ़ी है और गंगा संरक्षण की महत्वाकांक्षी योजना अभी भी ठोस नतीजे नहीं दे पाई है।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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