दक्षिण एशिया का शरबत रूह अफज़ा

हमदर्द का रूह अफजा सिर्फ एक शरबत नहीं बल्कि एक इतिहास बन चुका है। रूह अफज़ा एक ऐसा शरबत है जिसने देश के विभाजन के बाद भारत और पाकिस्तान में समान रूप् से बाजार पर कब्जा बनाए रखा। गहरे लाल रंग का यह शरबत अभी इसी साल जब गर्मियों में बाजार में नजर नहीं आया तो हलचल मच गई।

सन 1906 में हकीम अब्दुल मजीद ने दिल्ली के लाल कुआं इलाके में हमदर्द नाम का यूनानी दवाखाना खोला। फिर 1907 में एक सॉफ्ट ड्रिंक रूह अफजा मार्केट में लांच की। शीशे की बोतल में पैक रूह अफजा का लोगो तब मिर्जा नूर मोहम्मद ने बनाया था। इसके स्टीकर बॉम्बे से तब छप कर आये थे। इसमें तमाम जड़ी बूटियां, संदल, फलों के रस मिलाए गए थे, जिसके कारण इसको पीते ही ठंडक पहुंचती थी। हाथों हाथ रूह अफजा बिकना शुरू हो गया। इसका नाम लखनऊ के पंडित दया शंकर ’नसीम’ की किताब ’मसनवी गुलजार ए नसीम’ से लिया गया था जिसमे रूह अफजा नाम का एक पात्र था। सालों साल से रूह अफजा भारत में लोगों की पसंद बना रहा।

सन 1947 में जब भारत का बंटवारा हुआ और तब परिवार के एक सदस्य हकीम अब्दुल सईद पाकिस्तान चले गए जहां पर उन्होंने हमदर्द पकिस्तान की स्थापना की। इस तरह वहां भी रूह अफजा पहुंच गया। हकीम अब्दुल सईद ने रूह अफजा को पूर्वी पाकिस्तान में भी पहुंचाया और जब वो 1971 में बांग्लादेश बन गया तब उन्होंने अपना कारोबार समेटने के बजाए वहीं के कर्मचारियों को दे दिया। इस तरह आज रूह अफजा बांग्लादेश में भी है। यानी भारत से शुरू हुआ यह साफ्ट ड्रिंक प्रोडक्ट जैसे जैसे देश बनते गए वहां वहां पहुंचता गया।

रूह अफजा भले ही पहले एक चिकित्सीय पेय की तरह बनाया गया हो लेकिन जल्दी ही ये एक गर्मी में शीतलता देने वाला पेय बन गया। इसकी इतने दिन तक टिके रहने की वजह एक ये भी है कि ये अपनी पुरानी रेसिपी पर चल रहा है। इसका स्वाद कभी नहीं बदला। जिसने बचपन में रूह अफजा पिया है उसको आज भी वही स्वाद मिलता है। इससे एक लॉयल कस्टमर बेस तैयार होती गई।
रमजान जब जब गर्मी में हुए हैं तब हमेशा इफ्तार के समय ठंडा पेय जरूर बनाया जाता था। ऐसे में रूह अफजा आसानी से उपलब्ध रहता था। इसको बनाना भी बहुत आसान था। इसका कंसन्ट्रेट ठंडे पानी में घोलिए और रूह अफजा तैयार। लस्सी में ऊपर की सतह पर चार छह बूंद रूह अफज़ा के उसका मज़ा बढ़ा देते हैं।

इसकी एक और खासियत इसका रंग है। इसका लाल रंग अलग से आकर्षित करता है। धीरे धीरे रूह अफजा अब रमजान में इफ्तार का एक हिस्सा बन गया। इसीलिए इस बार गर्मियों में पड़े रमज़ान में जब इसकी कमी हुई तो हाय तौबा मच गई कि रमजान में रूह अफजा उपलब्ध नहीं है और मुसलमान परेशान हो रहे हैं। वैसे रमजान में रूह अफजा का शरबत बनाने का कोई धार्मिक महत्व नहीं है। रूह अफजा से सिर्फ शरबत नहीं बल्कि मिल्क शेक, लस्सी और आइसक्रीम तक बनाया जाता है। इतनी विविधता किसी एक ड्रिंक में नहीं मिलती है।

चीयर्स डेस्क

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