’तीसरी कसम’ से लगा झटका

फिल्मी दुनिया के बेहतरीन गीतकारों में शुमार होता है शैलेन्द्र का नाम। मुकेश के जो यादगार और सदाबहार गीत पूरी दुनिया में मशहूर हैं, उनमें ज्यादातर शैलेन्द्र के ही लिखे हुए हैं। पचास और साठ के दशक के गीतकार शैलेन्द्र मूल रूप से बिहार के थे। उनका जन्म हालांकि रावलपिंडी में हुआ था पर पालन पोषण मथुरा में हुआ। उनके पूर्वजों का मूल निवास बिहार के आरा जिले के अख्तियारपुर में स्थित है। अन्य कई सफल हस्तियों की तरह ही शैलेन्द्र को जब ’तीसरी क़सम’ से नाकामी हाथ लगी तो वह अपने आप को संभाल नहीं सके और मायूस होकर इतनी शराब पीने लगे कि फिर मौत ही हो गई। हालांकि ’तीसरी कसम’ के गीत बेहद सफल रहे और खूब लोकप्रिय हुए थे।

शैलेन्द्र ने मथुरा स्टेशन के पास एक तालाब के किनारे चट्टान पर बैठकर कविताओं की रचना शुरू की। शैलेन्द्र ने अपने करियर की शुरुआत 1947 में इंडियन रेलवे माटुंगा वर्कशॉप, मुंबई (तब बॉम्बे) से एक प्रशिक्षु के रूप में की थी। इन दिनों के दौरान कविता लिखना शुरू किया। राज कपूर ने एक मुशायरे में उनकी कविता ’जलता है पंजाब’ सुनी और फिल्म आग (1948) के लिए उसे खरीदने की पेशकश की। वामपंथी आईपीटीए के सदस्य शैलेन्द्र ने कह दिया कि वह कविताएं बेचने के लिए नहीं लिखते हैं। बाद में जब पत्नी गर्भवती हुईं तो उन्हें पैसों की जरूरत हुई तब उन्होंने खुद राज कपूर से संपर्क किया। इसके बाद से तो उनकी और राजकपूर की ऐसी निभने लगी कि हिट फिल्मों और हिट गानों का दौर ही चल गया। तब राज कपूर, शैलेंद्र और शंकर जयकिशन की तिकड़ी ने कई हिट गीतों को जन्म दिया। सन 1951 की फिल्म आवारा में उनका गीत ’आवारा हूं’ भारत के बाहर सबसे अधिक सराहा जाने वाला हिंदुस्तानी गीत बना।

शंकर जयकिशन के अलावा, शैलेंद्र ने सलिल चौधरी (मधुमती), सचिन देव बर्मन (गाइड, बंदिनी, काला बाजार), और रवि शंकर (अनुराधा) जैसे संगीतकारों के साथ काम किया। राज कपूर के अलावा, उन्होंने बिमल रॉय (दो बीघा जमीन, मधुमती, बंदिनी) और देव आनंद (गाइड और काला बाजार) जैसी फिल्मों के गीत लिखे।

1961 में शैलेन्द्र ने बसु भट्टाचार्य द्वारा निर्देशित और राज कपूर और वहीदा रहमान द्वारा अभिनीत फिल्म तीसरी कसम (1966) के निर्माण में भारी निवेश किया। फिल्म ने सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार जीते लेकिन व्यावसायिक रूप से विफल थी। इसी के बाद से वह अवसाद से घिर गए और घिरे तो फिर शराब के सहारे ही जिंदगी गुजारने लगे जिसका नतीजा यह हुआ कि गिरते स्वास्थ्य, नुकसान के कारण बढ़ते तनाव ने 14 दिसम्बर 1966 को उनकी जान ले ली। शैलेन्द्र के पुत्र शैली शैलेंद्र भी गीतकार बने। राज कपूर की फिल्म ’मेरा नाम जोकर’ के लिए उन्होंने शैलेन्द्र का अधूरा गीत, जीना यहाँ मरना यहाँ, पूरा किया। गीतकार गुलजार ने कहा है कि शैलेन्द्र हिंदी सिनेमा के सर्वश्रेष्ठ गीतकार थे। सन 1929 के अगस्त माह की 30 तारीख को जन्मे महान गीतकार शैलेन्द्र को चीयर्स डाॅट काॅम टीम की उनके 90 वें जन्म दिन पर भावभीनी श्रद्धांजलि।

चीयर्स डेस्क

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