क्या कभी गांवों के लिए भी बनेगी बीआईएस रिपोर्ट

भारतीय मानक ब्यूरो ने एक रिपोर्ट जारी की थी जिसमें दिल्ली समेत 20 राज्यों की राजधानियों के पानी की गुणवत्ता की जांच की गई थी। जिसमे मुंबई का पानी सब से साफ़ और दिल्ली का पानी सब से दूषित बताया गया था। इस रिपोर्ट के आने से राजनितिक गलियारों में हलचल मच गई वैसे आप को बता दें यह रिपोर्ट नल से आने वाले पानी को लेकर थी।  इस रिपोर्ट के बाद दिल्ली सरकार और केंद्र के बीच में शब्दबाण  शुरू हो गए थे। जहां का पानी सब से साफ़ बताया गया था वो देश की आर्थिक राजधानी है और जहां का पानी सब से खराब बताया गया था वो देश की राजधानी है दोनों जगह पर एक बात तो तय थी की यहाँ के निवासी साफ़ पानी के लिए वाटर प्यूरीफायर जो की चलन में हैं उसे लगवा सकते हैं। लेकिन देश के वो गांव जहाँ  पर पीने के पानी से कैंसर, लीवर और चर्म रोग जैसी बीमारियां फ़ैल रहीं हैं, उनके पानी की जांच कब की जाएगी और कब गांव के लोगों को पीने का साफ पानी मिल पाएगा यह एक सवाल है।

यूपी के बरेली जिले के बहरौली गांव के  हर दूसरे घर में एक व्यक्ति कैंसर का मरीज हैं। आलम यह है की 2018 में इस गांव के 70 लोगो की मौत का कारण कैंसर था। इस साल 2019 में भी इस गांव के लिए सिर्फ प्रयास ही किए जा रहे हैं।  जो कि नाकाफी हैं। गांव वालो की माने तो , उनके रिश्तेदार गाँव आने से कतराते हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि गाँव का पानी पीने से वे भी कैंसर की चपेट में आ सकते हैं। यही नहीं, दूसरे गाँव के लोग न तो हमारे गाँव की बेटियों से शादी करना चाहते हैं और न ही अपनी बेटियों को हमारे गाँव में भेजना चाहते हैं। रामगंगा नदी के किनारे बसे इस गाँव में इंडिया मार्का हैंडपंपों से आर्सेनिक युक्त पानी निकल रहा है। इस गाँव की तरह देश के सैकड़ों गाँव में दूषित पानी लोगों को समय से पहले बूढ़ा, कैंसर, मधुमेह और लीवर संबंधित बीमारियां दे रहा है।

यूपी के गोरखपुर का एक गांव हैं रक्षवापार जहा से इस समय के मुख्यमंत्री ताल्लुक रखते हैं इस गांव के लोगो का जीवन तब तक सामान्य चल रहा था जब तक गॉव के पानी की जांच करने एक टीम नहीं आई थी। टीम ने जांच कर बतया की गॉव के भू गर्भ का पानी विषैला हो गया हैं जिसमे आर्सेनिक की मात्रा बहुत बढ़ गयी हैं।  अब यह पानी सेहत के लिए खतरनाक हैं।

पश्‍चिमी यूपी  के जिले (सहारनपुर, शामली, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बागपत, गाजियाबाद) बागपत के गागनौली गांव में करीब 100 लोगों की मौत कैंसर से हो गई है। अभी 15 लोगों को कैंसर है। कोई ऐसा घर नहीं जहां कोई मरीज न हो। अब तो जन्‍म लेते बच्‍चों को भी कोई न कोई बीमारी होती है। इस जहरीली नदी ने इन्हें तबाह कर दिया। ये हाल कृष्‍णा नदी का है। इस गांव के 1600 परिवार इस नदी में तैर रहे जहर को पीने के लिए मजबूर हैं, जिसकी वजह से गांव के लोग कमजोर हो रहे हैं, बीमार पड़ रहे हैं और मर भी रहे हैं।

ऐसा नहीं है कि यह कहानी सिर्फ बागपत के गागनौली गांव तक सीमित है। बल्‍कि इस कहानी में पश्‍चिमी यूपी के 6 जिलों (सहारनपुर, शामली, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बागपत, गाजियाबाद) के 154 गांव शामिल हैं। इन 154 गांव के रहने वाले लाखों लोग तीन छोटी नदियों के प्रदूषण से परेशान हैं। यह नदियां हैं- हिंडन, कृष्णा और काली नदी। गांव वालों का कहना है कि इन नदियों में इंडस्‍ट्री का कैमिकल वाला पानी बहाया जाता है, जो कि रिस-रिसकर भूगर्भ जल से मिल गया है। ऐसे में इलाके का भूगर्भ जल पूरी तरह से खराब हो गया है।

छत्तीसगढ़ का सुपेबेड़ा गांव ऐसा है, जहां का भूमिगत पानी जहरीला है। लोग इस पानी को मजबूरी में पीते हैं और अपनी जान गंवाते हैं। एक अभिशाप की तरह लोग इस जहरीले पानी के शिकार हो रहे हैं। लोगों की मजबूरी है कि इन्हें पीने के लिए यही पानी उपलब्ध है। लोगों को पता है कि यह पानी अंदर अंदर उनकी किडनी गला रहा है और जिस्म को खोखला बना रहा है, बावजूद इसके लोगों के पास अपनी प्यास बुझाने का कोई दूसरा विकल्प नहीं है। पूर्व सरकार में एक फलोराइड रिमुवल प्लांट लगया था लेकिन वो अब किसी काम का नहीं हैं। अब धीरे धीरे यहां की आबादी कम हो रही है। लोग या तो गांव छोड़कर पलायन कर रहे हैं या फिर मौत के मुंह में समा रहे हैं। इस गांव में रह रहे युवक युवतियों की शादियां भी नहीं हो रहीं, जिसकी वजह से यहां की जनसंख्या बढ़ने की बजाय कम हो रही हैं।

औद्योगीकरण के कारण आज कारखानों की संख्या में बहुत वृद्धि हुई है। इनसे निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थों को नदियों, नहरों, तालाबों आदि किसी अन्य स्रोतों में बहा दिया जाता है, जिससे जल में रहने, वाले जीव-जन्तुओं व पौधों पर तो बुरा प्रभाव पड़ता ही है साथ ही जल पीने योग्य नहीं रहता और प्रदूषित हो जाता है। ज्यादातर कारखाने शहर से दूर ग्रामीण क्षेत्रों में लगते आए हैं या लग रहे हैं और समुचित प्रबंधन न होने कारण इनसे निकलने वाला दूषित जल भूजल को प्रभावित कर रहा है।

चीयर्स डेस्क 

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