’ओल्ड टाॅम’ के तीन पैग रोज़ पीते थे चचा ग़ालिब

चचा ग़ालिब शराब के बेहद शौक़ीन थे, ख़ूब पीते थे। शराब की हिमायत में उन्होंने दर्जनों शेर लिखे हैं। टोका टोकी होती थी तो जब तब उड़ा भी दिया करते थे कि छोड़ दी है। एक बार उनसे किसी ने पूछा कि क्या आपने वाक़ई छोड़ दी है, तो इस पर उन्होंने जवाब में कहा कि अरे, मुझे तो शराब छोड़े हुए ज़माना हो गया और सुना दिया अपना ये शेर:

ग़ालिब छुटी शराब पर अब भी कभी कभी
पीता हूं रोज़-ए-अब्र-ओ-शबे माहताब में

यानी, ग़ालिब ने शराब तो छोड़ दी है लेकिन कभी कभी जब आसमान में बादल छाए होते हैं या जिस रात चांद निकलता है, उस रात पी लेता हूं। ग़ालिब ने इस शेर के ज़रिए बेहद शालीन मासूमियत से बता दिया कि यूं तो छोड़ दी है, लेकिन फिर भी कभी कभी पी भी लेते हैं। शेर का मतलब साफ है, अरे या तो बादल होंगे या फिर चांद निकला होगा। इस तरह रोज़ पी सकते हैं। सच तो ये है कि चचा को चाहिए रोज़ थी। छोड़ी तो उन्होंने कभी नहीं। खूबसूरत बहाने बनाते रहे इसी तरह।

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ग़ालिब पीते तो थे ही, रोज़ पीते थे, लेकिन कौन सी पीते थे। ये कम ही लोगों को पता है। उन्होंने हमेशा बेहतरीन शराब पी। ’खु़तूते ग़ालिब’ जो चचा की चिट्ठियों का संकलन है, उसमें छपे एक ख़त में फरमाते हैं ’मेरे लिए मेरठ की छावनी से बेहद उम्दा शराब आती है, और ढेर सी आती है…..’। इससे पता चलता है कि वो बढ़िया अंग्रेजी पीते थे और उनका ब्रांड था ’ओल्ड टाॅम’।

ओल्ड टाॅम दरअसल बेहद शानदार किस्म की लंदन की अनूठी जिन है। ये दूसरी जिन से ज्यादा मीठी और हल्की होती है। सत्रहवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में ओल्ड टाॅम जिन लंदन और ब्रिटेन के कई हिस्सों में इतनी लोकप्रिय थी कि इसके प्रेमी इसकी एक एक चुस्की के लिए लंदन की दीवारों पर लगे काली बिल्ली के मुंह के स्टाइल के इसके डिस्पेंसर्स में सिक्के डालकर इस जिन को ले लिया करते थे। पुराने ज़माने की इस जिन का आजकल मिलना मुहाल है। हेमैन कंपनी ने पुरानी रेसीपी पर अब इसे फिर से बनाना शुरु किया है। इसी नाम से कुछ कंपनियों ने व्हिस्की भी बनाई और जमैका की एक कंपनी ने रम भी तैयार की। लेकिन असली ओल्ड टाॅम जिन ही है।

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ग़ालिब इसी ओल्ड टाॅम जिन के तीन पैग रोज़ पिया करते थे। दिल्ली की गली बल्ली मारान में उनकी हवेली के मोड़ पर कभी तीन पैग से पहले और कभी तीन पैग के बाद वह कबाब खाते थे। ये वो दौर था जब दिल्ली का हाकिम सर थाॅमस मेटकाॅफ था। वही मेटकाॅफ जिनकी शानदार कोठी के अवशेष अब भी तीस हजारी के उत्तर की तरफ मटका कोठी के नाम से हैं। थाॅमस मेटकाॅफ लंदन के एक सामंती परिवार में पैदा हुए और मुग़लों के दरबार में ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रतिनिधि थे। नैपोलियन बोनापार्ट के बड़े भारी फैन थे और शराब के भी रसिया। उनसे भी ग़ालिब ने पत्र व्यवहार किया और फिर उनके दोस्त हो गए, क्योंकि थामस मेटकाॅफ भी ओल्ड टाॅम का ही शौकीन था। मिर्ज़ा ग़लिब के जीवन पर आधारित अल्ताफ हुसैन हाली की ’यादगारे ग़ालिब’ और ग़ुलाम रसूल मेहर की किताब ’ग़ालिब’ में भी इसके हवाले मिलते हैं। मिर्ज़ा असदुल्लाह ग़ालिब (जन्म 1797, मृत्यु 1869) को भारत के महान कवियों में गिना जाता है।

चीयर्स डेस्क



 

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