इस गांव में आलीशान मकान पर पीने को पानी नहीं

झारखंड के बोकारो जिले में गोमिया प्रखंड के आदिवासी बहुल गांव सियारी में करीब 300 घर है।  जहां अधिकतर लोग खेती पर निर्भर हैं। कुछ लोग मजदूरी भी करते हैं। बावजूद यहां जलापूर्ति की व्यवस्था नहीं है। एक छोड़ दो-दो बहुद्देश्यीय आलीशान भवन हैं। करोड़ों की लागत से बने दोनों भवन भले ही किसी उपयोग में नहीं आ रहे हैं। वह अपनी भव्यता से ही बदहाली पर पर्दा डालने का प्रयास कर रहे हैं। दोनों भवन झाड़ियों से घिरकर बेकार पड़े हैं।

सियारी पंचायत में रोजगार का कोई साधन भी नहीं है। लोग केवल वर्षा आधारित खेती पर ही निर्भर हैं। हालांकि वित्तीय वर्ष 2005-06 में करीब 45 लाख की लागत से चेकडैम बना है। विभिन्न खामियों के कारण अनुपयोगी साबित हुआ। ऐसे में सवाल उठता है कि जिस गांव के लोगों के पास दो वक्त की रोटी, नहीं। पीने के लिए स्वच्छ पानी नहीं। रोजगार के कोई साधन नहीं। बीमार होने पर इलाज की कोई व्यवस्था नहीं, वहां करोड़ों की लागत से बने सांस्कृतिक कला केंद्र सह ग्राम संसद भवन ग्रामीणों के लिए कितना उपयोगी होगा?

इस गांव में ऊंची इमारत बनाने में करोड़ों रुपये खर्च किए गए हैं, लेकिन जीवन के लिए सर्वाधिक जरूरी जलापूर्ति की व्यवस्था अबतक नहीं की गई। यही कारण है कि यहां के लोग जोरिया का दूषित पानी से प्यास बुझा रहे हैं। उच्च शिक्षा के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। अधिकतर बच्चे मध्य विद्यालय से अधिक की पढ़ाई नहीं कर पा रहे हैं। लोग पगडंडियों के सहारे आवागमन करने की दिक्कत झेल रहे हैं।

सियारी ग्राम के सोमर मांझी, लालजी मांझी, धनेश्वर मांझी, साहेबराम मांझी, हीरालाल गंझू आदि ग्रामीणों ने कहा कि यहां पीने का पानी 2-3 किलोमीटर दूर जोरिया से लाना पड़ता है। एक-एक घंटा इंतजार करने के बाद जोरिया किनारे खोदे चुआं से पानी मिल पाता है। इलाज के अभाव में मलेरिया से हर साल कई जान चली जाती है। लोगों को रोजगार के लिए बाहर जाना पड़ता है। यहां करोड़ों खर्च कर भव्य भवन बनाकर सरकारी राशि का महज दुरुपयोग किया गया। उस भवन से ग्रामीणों को कोई लाभ नहीं।

चीयर्स डेस्क 

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