अपात्र के लिए नहीं है सोमरस !

कल्पना कीजिए, आज से हजारों साल पहले भारतीय सभ्यता के प्राचीन काल खंड के किसी एक युग विशेष में आप स्वयं मौजूद हैं। शुक्ल पक्ष की रात में चंद्रमा की दुधिया रोशनी में अपने मित्रों के साथ पहाड़ों में आप एक खास प्रकार का पौधा ढूंढ रहे हैं। उसे बड़ी मात्रा में एकत्र कर आप एक गाड़ी में रखते हैं, जिन्हें दो भेड़ें खींच कर बलि स्थल तक ले जाती हैं। बलि स्थल का पुजारी उन पौधों को ले कर एक एकांत प्रकोष्ठ में जाता है, जहां उनकी सफाई की जाती है और उनकी जड़ों को पत्थरों पर पीसा जाता है। एक बड़े पात्र पर ढेर सारा उन रखा है। वह पीसा हुआ लेप उन पर डाला जाता है, जहां से उसका रस छन कर उस पात्र में टपकता है।

इस क्रिया के संपन्न होने के बाद पुजारी मंत्रोच्चार करता हुआ उस पात्र में दूध तथा कई प्रकार के अनाजों का घोल डालता है, जिससे शीघ्र ही उसमें किण्वन की  प्रक्रिया शुरू हो जाती है। यह खमीर उस रस को मादक बना देता है। यह सोम रस है। पुजारी के अलावा और कोई नहीं जानता कि उस रस के निर्माण का मंत्र क्या है और कौन सा द्रव्य किस अनुपात में और किस चरण में मिलाया गया है। लेकिन यह पेय उस आयोजन के लिए तैयार किया गया सर्व श्रेष्ठ पेय है, जो सबसे सम्मानित अतिथि को दिया जाएगा।

ऋग्वेद में सोम रस के निर्माण का बहुत ही चित्रात्मक वर्णन मिलता है। ईसा से लगभग पंद्रह सौ से हजार साल पहले तक की अवधि में लिखे गए हमारे पौराणिक ग्रंथों में इसका संबंध इंद्र, वरुण और अग्नि जैसे आर्य देवताओं तथा अंगीरस, बृहस्पति और गौतम जैसे ऋषियों से देखने को मिलता है। यह चंद्र देव अर्थात सोम की पूजा से भी संबंधित है।

यूनान, मिस्र और बेबिलोन की प्राचीन सभ्यताओं की तरह भारतीय सभ्यता में भी सोम रस की बहुत प्रतिष्ठा रही है। इसे पशुओं की खाल से बनी थैलियों में सुरक्षित रखा जाता था। इसे पूज्य जनों को अर्पित किया जाता था। कुछ जगहों पर यह सामान्य जन को भी उपलब्ध था। कहीं कहीं इसके विपणन का भी उल्लेख मिलता है। लेकिन इसे बनाने की विधि सिर्फ अभिजात्य वर्ग को ही मालूम थी। प्राचीन भारत में सोम रस के सेवन पर किए गए एक शोध में यह बताया गया है कि ‘ऋग्वेद में इसे स्वस्थ्य बनाने वाला, भयमुक्त करने वाला तथा स्वर्ग का मार्ग प्रशस्त करने वाला’ बताया गया है। ओत्तिलिंगम सोमसुंदरम, डी विजय राघवन और ए जी तेजस मूर्ति द्वारा संयुक्त रूप से किए गए इस शोध का सारांश इंडियन जर्नल आफ सायकियाट्री के जनवरी मार्च 2016 के अंक में उपलब्ध है।

मनुष्य की भावना और चेतना पर इसके मादक प्रभाव के कारण बाद में मदिरा और मद्य जैसे इसके और भी कई नाम हो गए। हमारी प्राचीन सभ्यता के परावर्ती दिनों में यह महसूस किया जाने लगा कि समान्य जन इसे संभाल नहीं पाते हैं। नशे के आधिक्य की वजह से वे अपने उपर से नियंत्रण खो देते हैं और अनिष्ट करते हैं। इसीलिए मनु स्मृति के रचना काल के आते आते इसे वर्जित पेय समझा जाने लगा। मनु स्मृति में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि राजा इसका विपणन अविलंब बंद करे दे और स्वयं भी इसका सेवन कभी न करे।

डाॅ. बाल मुकुंद

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